गुवाहाटी:- पत्नी द्वारा पति पर माता-पिता से दूर रहने का दबाव बनाना क्रूरता : गुवाहाटी हाईकोर्ट ( रिपोर्ट:- राजेश कुमार यादव )

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पत्नी द्वारा पति पर माता-पिता से दूर रहने का दबाव बनाना क्रूरता : गुवाहाटी हाईकोर्ट

रिपोर्ट राजेश कुमार यादव

गुवाहाटी:- हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति की तलाक की अपील इस आधार पर स्वीकार कर ली कि उसकी पत्नी उसे उसकी सौतेली मां से दूर रहने के लिए मजबूर कर रही थी।

मुख्य न्यायाधीश अजय लांबा और न्यायमूर्ति सौमित्रा सैकिया* की पीठ ने कहा कि  मैंटेनेंस एंड वेल्फेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट 2007 के तहत, बच्चों (जिसमें बेटा भी शामिल है) को अनिवार्य रूप से अपने माता-पिता (जिसमें सौतेली मां भी शामिल है) और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण करना होगा।

इस मामले में न्यायालय एक वैवाहिक अपील (पति की तरफ से दायर) पर विचार कर रहा था। जिला न्यायालय ने पति की तरफ से दायर तलाक का आवेदन खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस अपील पर विचार करने के बाद कहा कि यह सबूत सामने आए हैं कि सौतेली मां के पास आय का कोई व्यक्तिगत स्रोत नहीं है और वह एक वरिष्ठ नागरिक है।

अदालत ने उस समझौते पर भी विचार किया जो पति और उसके परिवार के सदस्यों ने अग्रिम जमानत मांगने से पहले पत्नी के कहने पर मजबूरी में निष्पादित किया था। इस समझौते में यह शर्त रखी गई थी कि पति को परिवार के सदस्यों से अलग रहना होगा। पति की सौतेली माँ सहित परिवार के किसी भी सदस्य को उनसे मिलने की अनुमति नहीं होगी।

इन पर ध्यान देते हुए अदालत ने कहा कि-

“यह देखने में आया है कि फैमिली कोर्ट ने सबूतों पर विचार करने के दौरान इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया था। जबकि अपीलकर्ता को एक्ट 2007 के प्रावधानों के तहत उसका वैधानिक कर्तव्य पूरा करने से रोका गया है,जो उसका अपनी वृद्ध मां के प्रति बनता है। इस तरह के सबूत क्रूरता का कृत्य साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। क्योंकि 2007 अधिनियम के प्रावधानों का पालन न करने के आपराधिक परिणाम होते हैं,जिनमें दंड या कारावास के साथ-साथ जुर्माना किए जाने का भी प्रावधान है।”

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि पत्नी ने आईपीसी की धारा 498ए के तहत केस दायर किया था,जिसमें बरी कर दिया गया था।

”जब कोई पत्नी अपने पति पर *आईपीसी की धारा 498ए के तहत* आरोप लगाती है और आरोपी पति उस मुकदमे से गुजरता है व अंत में बरी हो जाता है। तो इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि पति के प्रति कोई क्रूरता नहीं हुई है।”

2016 में, सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक पति को तलाक देते समय यही टिप्पणी की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि पति को उसके माता-पिता से अलग रहने के लिए मजबूर किया गया था। आम तौर पर, कोई भी पति इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। वहीं कोई भी बेटा अपने बूढ़े माता-पिता व परिवार के अन्य सदस्यों से अलग नहीं होना चाहेगा, खासतौर पर जब वह भी उसकी आय पर निर्भर हों।

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