पत्नी भले ही अपना व्यवसाय करके कमाती हो, फिर भी है वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार : बॉम्बे हाईकोर्ट। ( रिपोर्ट:-राजेश कुमार यादव )

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पत्नी भले ही अपना व्यवसाय करके कमाती हो, फिर भी है वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार : बॉम्बे हाईकोर्ट

रिपोर्ट:-राजेश कुमार यादव

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में पुणे के एक 51 वर्षीय व्यक्ति की तरफ से दायर आपराधिक पुनरीक्षण आवेदन पर सुनवाई करते हुए कहा कि भले ही पत्नी अपना व्यवसाय करती हो और उससे पैसे कमा रही हो, फिर भी वह गुजारा भत्ता या रखरखाव पाने की हकदार है।

इस व्यक्ति ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे निर्देश दिया गया था कि वह अपनी पूर्व-पत्नी को मासिक रखरखाव का भुगतान करे।

हालांकि न्यायमूर्ति एनजे जामदार ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने इस तथ्य पर पर्याप्त रूप से विचार नहीं किया कि आवेदक की पत्नी के पास आय का एक स्रोत है, इसलिए उस सीमा तक रिवीजन एप्लीकेशन को अनुमति प्रदान की जा रही है और रखरखाव की राशि को 15,000 रुपये प्रति माह से घटाकर 12,000 रुपये प्रति माह किया जा रहा है।

क्या था मामला

इस जोड़े का विवाह 12 नवंबर, 1997 को हिंदू धार्मिक संस्कार के अनुसार हुआ था। पत्नी के अनुसार वैवाहिक जीवन की शुरुआत के बाद से ही उसके पति ने उसके साथ बहुत क्रूरता से व्यवहार किया। उसका पति उसे जनवरी 1999 में उसके पैतृक घर सतारा छोड़कर चला गया था।

बार-बार आश्वासन देने के बावजूद भी वह उसे उसके वैवाहिक घर वापस नहीं लेकर गया। अंततः पुलिस के हस्तक्षेप के बाद उसको महात्मा सोसाइटी, पुणे में स्थित उसके वैवाहिक घर में प्रवेश करने की अनुमति दी गई।

उसके बाद पति-पत्नी ने वैवाहिक घर छोड़ दिया और ससुराल के लोगों से अलग रहने लग गए। इसके बाद अप्रैल, 2007 में उसके पति ने उससे तलाक लेने की इच्छा जाहिर की। हालांकि शुरुआत में पत्नी ने विरोध किया, परंतु बाद में उसने आपसी सहमति से तलाक लेने की याचिका के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए। चूंकि उसके पति ने उसको आश्वासन दिया था कि वह तलाक की इस डिक्री के बावजूद भी उसके साथ वैवाहिक संबंध बनाए रखेगा। इसलिए आपसी सहमति से तलाक की एक डिक्री 25 अक्टूबर, 2007 को प्राप्त कर ली गई थी।

विवाह खत्म हो जाने के बावजूद भी पति अपनी पूर्व पत्नी के अपार्टमेंट में आता-जाता था और उसके साथ वैवाहिक संबंध भी बनाए, लेकिन, सितंबर 2012 से उसने अपनी पूर्व पत्नी के घर आना-जाना बंद कर दिया, जिसके बाद उसकी पूर्व पत्नी ने दावा किया कि उसके पास अपने रखरखाव और आजीविका के लिए कोई साधन नहीं है। उसने यह भी कहा कि वह केवल अपने पिता से मिल रही वित्तीय सहायता पर गुजारा कर रही है। जबकि इसके विपरीत उसके पूर्व पति के पास पर्याप्त साधन हैं।

इसलिए उसने आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अपने पूर्व पति से 50,000 रुपये प्रतिमाह की दर से रखरखाव मांगा था, परंतु पति अदालत के समक्ष पेश हुआ और अपनी उसने अपनी पूर्व पत्नी की इस मांग का विरोध किया। उसने इस बात भी विरोध किया कि उसने कभी अपनी पूर्व पत्नी के साथ बुरा व्यवहार किया था।

इसके विपरीत उसने अदालत को यह बताया कि उसकी पूर्व पत्नी मनोवैज्ञानिक बीमारी से पीड़ित थी, इसलिए इस विवाह को निभाना मुश्किल हो गया था। ऐसे में उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12 (1) (ए) और धारा 13 (1) ( ia) के तहत याचिका दायर की थी। इतना ही नहीं उसने यह भी दलील दी थी कि अब उसकी पूर्व पत्नी ‘कल्याणी ब्यूटी पार्लर’ नाम से एक ब्यूटी पार्लर चलाती है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो गई है। इसलिए उसे तलाक की डिक्री पारित होने से पहले आपसी समझौते के हिस्से के तौर पर धारा 125 के तहत रखरखाव मांगना चाहिए था। 2011 में पति ने पुनर्विवाह कर किया और व्यवसाय आदि में नुकसान का हवाला देते हुए फिर से रखरखाव की मांग का विरोध किया।

अंत में फैमिली कोर्ट के जज ने माना कि महिला अपना रखरखाव करने में सक्षम नहीं है और उसके पूर्व पति ने उसकी उपेक्षा की है, जबकि उसके पूर्व पति के पास पर्याप्त साधन है कि वह अपनी पूर्व पत्नी का रखरखाव कर सकता है।

फैमिली कोर्ट ने इस मामले में कहा था कि-

”यह सच है कि महिला ने अपने रखरखाव का दावा उस समय छोड़ दिया था, जब आपसी सहमति से तलाक के लिए डिक्री पारित की गई थी, परंतु यह तथ्य महिला को उसके रखरखाव मांगने के दावे से अलग नहीं करता है, क्योंकि रखरखाव का दावा न करना या रखरखाव के अधिकार को माफ करने के लिए किया गया इस तरह का समझौता पब्लिक पॉलिसी का विरोधी है।

धारा 125 (1) के स्पष्टीकरण (बी) के तहत बताए गए अर्थ के तहत एक पत्नी है और तलाकशुदा भी है। ऐसे में पति से अलग रहने के लिए किया गया समझौता उसे उसके रखरखाव के दावे से विमुख नहीं कर सकता है।”

कोर्ट का फैसला

आवेदक पति की तरफ से वकील सीमा सरनाईक उपस्थित हुई और प्रतिवादी पत्नी की तरफ से अधिवक्ता हितेश व्यास उपस्थित हुए।

कोर्ट ने रामचंद्र लक्ष्मण कांबले बनाम शोभा रामचंद्र कांबले, 2019 में हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कई घोषणाओं के बाद न्यायालय ने इस आशय पर कानूनी स्थिति साफ की थी और कहा था कि कई फैसलों में यह कहा गया है कि एक समझौता ,जिसके तहत कोई पत्नी भविष्य में अपने रखरखाव का दावा करने के अधिकार छोड़ देती है या त्याग देती है, ऐसे समझौते सार्वजनिक नीति के विरोधी हैं। इसलिए, इस तरह के समझौते, भले ही स्वेच्छा से किए गए हो फिर भी लागू करने योग्य नहीं है।

इसके बाद न्यायमूर्ति जामदार ने कहा कि जिस तरह से आवेदक की पत्नी ने अपनी जिरह में निष्प्क्षता दिखाई है,वह बातें महत्व रखती हैं। उसने साफ शब्दों में स्वीकार किया कि जब उसने आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका दायर की थी, तो वह उस फ्लैट से ब्यूटी पार्लर का कारोबार चला रही थी, जहाँ वह रह रही थी। कोर्ट ने कहा कि उसने यह भी स्वीकार किया कि उसने ब्यूटीशियन का कोर्स किया है और वह ब्यूटी पार्लर चलाती है।

दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद जस्टिस जामदार ने कहा कि-

”रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री पर विचार करने के बाद मेरा मानना है कि प्रतिवादी पत्नी के उस दावे को फैमिली कोर्ट ने एक चुटकी नमक के साथ स्वीकार कर लिया था कि उसके पास आय का कोई स्रोत नहीं है। जबकि पेश साक्ष्यों व रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री से यह पता चलता है कि वह अपनी आजीविका बनाए रखने के लिए कल्याणी ब्यूटी पार्लर एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट नामक उक्त व्यवसाय को चला रही है।”

हालांकि इसी समय न्यायालय ने यह भी कहा कि पत्नी कुछ व्यवसाय करती है और कुछ पैसे कमाती है,यह बातें इस मामले का अंत नहीं है-

”न तो कमाने की संभावित क्षमता और न ही वास्तविक कमाई,चाहे जो भी हो,किसी भी मामले में रखरखाव के दावे से इनकार करने के लिए पर्याप्त नहीं है। फैमिली कोर्ट के जज ने इस मामले में ‘सुनीता कचवा बनाम अनिल कचवा’ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय का हवाला देकर ठीक किया है।”

पूर्वोक्त निर्णय में शीर्ष अदालत ने कहा था कि केवल इस आधार पर पत्नी के रखरखाव या गुजारे भत्ते के दावे को खारिज नहीं किया गया जाएगा कि वह स्वयं भी कुछ कमा रही है।

अंत में न्यायालय ने कहा कि इस मुद्रास्फीतीय अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। इसलिए ब्यूटी पार्लर के व्यवसाय से होने वाली आय प्रतिवादी पत्नी की आजीविका के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है क्योंकि इस व्यवसाय की आय सीजन पर निर्भर है। न ही इस आय से उसे जीवन का वह स्टैंडर्ड मिल सकता है,जिस तरह का जीवन वह तलाक से पहले जी रही थी।
इस प्रकार न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट ने आवेदक की पत्नी की आय के स्रोत पर ठीक से विचार नहीं किया था इसलिए उसकी पत्नी को उसके जीवन का स्टैंडर्ड बनाए रखने में सहायता करने के लिए 15000 रुपये की बजाय 12,000 रुपये प्रति माह देना पर्याप्त होगा।

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