सन्तकबीरनगर:- कोटेदार के घटतौली के खिलाफ ग्रामीणों ने किया विरोध , पुलिस ने भांजी लाठियां (रिपोर्ट:- विजय गुप्ता)

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कोटेदार के घटतौली के खिलाफ ग्रामीणों ने किया विरोध , पुलिस ने भांजी लाठियां

रिपोर्ट:- विजय गुप्ता

संतकबीरनगर:- महुली थाना क्षेत्र के ग्राम कोदवट मे शुक्रवार की दोपहर तपती धूप मे सैकडों की संख्या मे महिलाएं और पुरुष लाकडाउन के आदेश और शोशल डिस्टेंसिंग के फरमान को ताक पर रख कर जमा थे। आसमान से चिन्गारी फेंकती सूर्य की किरणों से भी अधिक ताप गांव के उन गरीब उपभोक्ताओं की आंखों मे नजर आ रहा था। पता चला कि पिछले कुछ माह से कोटेदार द्वारा राशन कम तौला जा रहा था। शुक्रवार को जब सरकार द्वारा इन्ही गरीबों के लिए भेजा गया मुफ्त चावल वितरित हो रहा था तो गांव के ही एक युवक ने घटतौली का विरोध कर दिया। आरोप है कि अपने अधिकार के प्रति जागरूकता दिखाने वाले उक्त युवक से कोटेदार और उसके परिजनों ने दुर्व्यवहार कर दिया। ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ देख उपभोक्ता भड़क उठे। एसडीएम प्रमोद कुमार को भी मौके पर पहुंचना पड़ा। उनकी जांच मे इलेक्ट्रॉनिक कांटें मे 20 ग्राम की हेराफेरी भी पकड़ी गई। एसडीएम की अपील पर भी जब ग्रामीण नही हटे तो इन्स्पेक्टर प्रदीप कुमार सिंह को मौके पर पहुंच लाठियां भी भांजनी पड़ी। सवाल यह है कि पिछले 24 दिनों से सरकार के लाकडाउन और शोशल डिस्टेंसिंग के आदेशों को सर आंखों पर रखकर चलने वाली गांव की यह आबादी आखिर बगावत पर क्यों उतर गई? कॅरोना जैसे खतरनाक और जानलेवा वायरस का भी खौफ पर इनका गुस्सा भारी क्यों पड गया? ग्रामीण जब तौल की जांच के लिए अपना राशन लेकर एसडीएम के पास पहुंचे तो कोटेदार ने यह कह कर तौल मानने से इन्कार कर दिया कि ग्रामीण अपने घर पर राशन निकाल लिये होंगे। जिससे एसडीएम भी सहमत नजर आए। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि एसडीएम के आने की सूचना पर क्या कोटेदार अपना इलेक्ट्रॉनिक कांटा नही बदल सकता है? फिलहाल ग्रामीणों का तर्क स्थानीय प्रशासन ने खारिज कर दिया। कोटेदार का तर्क था कि राजनैतिक स्वार्थ वाले लोगों के उकसाने पर ऐसी स्थिति खड़ी हुई। कहीं ना कहीं मौके पर मौजूद प्रशासनिक अमला भी कोटेदार के तर्क से सहमत नजर आ रहा था। यह भी सही है कि ग्रामीणों ने लाकडाउन का उल्लंघन करके और शोशल डिस्टेंसिंग के आदेशों की धज्जियां उड़ा कर कानून तोडने का काम भी किया है। ग्रामीणों से बात करने, समूचे हालात को समझने और लोगों के दर्द को महसूस करने के बाद यही लगा कि जब देश के लोकतंत्र को अपने कंधों पर थामें गांवों की यह भोली भाली आवाम बगावत करके मौत से भी नजरें लडाने लगे तो इसी को इन्कलाब कहते हैं। ऐसे मे आपदा और संकट के समय जिम्मेदार अधिकारियों को इनके बगावती होने के हालात पर भी गौर करना चाहिए।

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